Saturday, June 15, 2013

वक़्त नहीं

हर ख़ुशी है लोगों के दामन में
पर एक हंसी के लिए वक़्त नहीं
दिन रात दौड़ती दुनिया में
ज़िन्दगी के लिए ही वक़्त नहीं..

माँ की लोरी का एहसास तो है
पर माँ को माँ कहने का वक़्त नहीं
सारे रिश्तों को हम मार चुके
अब उन्हें दफनाने का भी वक़्त नहीं..

सारे नाम मोबाइल में हैं
पर दोस्ती के लिए वक़्त नहीं
गैरों की क्या बात करें, जनाब,
जब अपनों के लिए ही वक़्त नहीं..

आँखों में है नींद बड़ी
पर सोने का वक़्त नहीं
दिल है ग़मों से भरा हुआ
पर रोने का वक़्त नहीं..

पैसों की दौड़ में ऐसे दौड़े
की थकने का भी वक़्त नहीं
पराये एहसानों की क्या कद्र करें
जब अपने सपनों के लिए ही वक़्त नहीं..

तू ही बता ऐ ज़िन्दगी
इस ज़िन्दगी का क्या होगा
की हर पल मरने वालों को
जीने का भी वक़्त नहीं..

Friday, May 31, 2013

कल ये हों ना हों

आज एक बार सबसे मुस्करा के बात करो
बिताये हुये पलों को साथ साथ याद करो
क्या पता कल चेहरे को मुस्कुराना
और दिमाग को पुराने पल याद हो ना हो..

आज एक बार फ़िर पुरानी बातो मे खो जाओ
आज एक बार फ़िर पुरानी यादो मे डूब जाओ
क्या पता कल ये बाते
और ये यादें हो ना हो

आज एक बार मन्दिर हो आओ
पुजा कर के प्रसाद भी चढाओ
क्या पता कल के कलयुग मे
भगवान पर लोगों की श्रद्धा हो ना हो

बारीश मे आज खुब भीगो
झुम झुम के बचपन की तरह नाचो
क्या पता बीते हुये बचपन की तरह
कल ये बारीश भी हो ना हो

आज हर काम खूब दिल लगा कर करो
उसे तय समय से पहले पुरा करो
क्या पता आज की तरह
कल बाजुओं मे ताकत हो ना हो

आज एक बार चैन की नीन्द सो जाओ
आज कोई अच्छा सा सपना भी देखो
क्या पता कल जिन्दगी मे चैन
और आखों मे कोई सपना हो ना हो....

Friday, May 10, 2013

चाँद


अगर चाँद असमान से उतरे तो आम हो जाये,
तेरे नाम की एक खूबसूरत शाम हो जाये,
अजब हालात हुए की दिल का सौदा हो गया,
मुहब्बत की हवेली जिस तरह नीलाम हो जाये,
मैं खुद भी तुझसे मिलने की कोशिश नहीं करूँगा,
क्योंकि नहीं चाहता कोई मेरे लिए बदनाम हो जाये,
उजाले अपनी यादों के मेरे साथ रहने दो,,,,
जाने किस गली में जिंदगी की शाम हो जाये !!

कोई पैगाम नहीं





कोई पैगाम नहीं ......
जो गुजर गयी उसकी क्यों शाम नहीं......
लाख तदबीर की दर्द-ए-दिल को क्यों आराम नहीं ......
मेरे नाम से क्यों तू गुमनाम नहीं ....
हर शक्श की किस्मत मै क्यों इनाम नहीं .....
माना दिल के अहसासों का कोई दाम नहीं ....
पर मेरी कहानी मै अब क्यों तेरा नाम नहीं ....
मुझे डर है आरज़ू न तेरी मिट जाये “शमा”....
कई दिनों से तेरा कोई पयाम, कोई पैगाम नहीं ......


Tuesday, April 2, 2013

कानपुर


इस शहर में सब कुछ अपना सा लगता है,
जीवन इस शहर में सपना सा लगता है

वो खुबसूरत सी मोतीझील की शाम
हाथों में हाथ लिए प्रणय संबंधों के नाम,

रेव मोती से लेकर जे के टेम्पल का सफ़र
यहाँ होता है नए रिश्ते जुड़ने का काम,

स्टूडेंट्स के है यहाँ दो ठिकाना
कभी बनारसी वाले की चाय तो कभी नालंदा वाले का खाना

अब हॉस्टल का स्टाइल भी घर सा लगता है,
जीवन इस शहर में सपना सा लगता है,

वो चिड़ियाघर जाना, दोस्तों को चिढाना
और गिलहरियों को पॉपकॉर्न खिलाना,

शाम को आना पढ़ते पढ़ते सो जाना
और सपनों में भी कानपूर में खो जाना,

इस शहर के हर एक मोड़ से रिश्ता पुराना सा लगता है,
जीवन इस शहर में सपना सा लगता है.

Saturday, March 2, 2013

आवारापन

तुम पूछो और मैं न बताऊँ ऐसे तो हालात नहीं,
एक ज़रा सा दिल टूटा है और तो कोई बात नहीं

किस को ख़बर थी साँवले बादल बिन बरसे उड़ जाते हैं,
सावन आया लेकिन अपनी क़िस्मत में बरसात नहीं

माना जीवन में औरत एक बार मोहब्बत करती है,
लेकिन मुझको ये तो बता दे क्या तू औरत ज़ात नहीं

ख़त्म हुआ मेरा अफ़साना अब ये आँसू पोंछ भी लो,
जिस में कोई तारा चमके आज की रात वो रात नहीं

मेरे ग़मगीं होने पर अहबाब हैं यों हैरान "क़तील",
जैसे मैं पत्थर हूँ मेरे सीने में जज़्बात नहीं..

Sunday, February 17, 2013

मै

तुम नयी विदेशी मिक्सी हो,मै पत्थर का सिलबट्टा हूँ !
तुम AK 47 जैसी, मै तो एक देसी कट्टा हूँ !

तुम चतुर राबड़ी देवी सी, मै भोला भाला लालू हूँ !
तुम मुक्त शेरनी जंगल की, मै चिड़ियाघर का भालू हूँ !

तुम व्यस्त सोनिया गाँधी सी, मै अटल बिहारी सा खाली हूँ !
तुम हंसी माधुरी दिक्षित की, मै पुलिसमैन की गाली हूँ !

कल जेल अगर हो जाए प्रिये, दिलवा देना तुम बेल प्रिये !
मुश्किल है अपना मेल प्रिये, ये प्यार नहीं है खेल प्रिये!!

मै ढाबे के ढांचे जैसा, तुम पांच सितारा होटल हो !
मै महुवे का देशी ठर्रा , तुम रेड लेबल की बोतल हो !!

तुम रंगोली का मधुर गीत, मै कृषि दर्शन की झाड़ी हूँ!!
तुम विश्वसुन्दरी सी कमाल, मै तेलिया छाप कबाड़ी हूँ!!

तुम सोनी का हो मोबाइल, मै टेलीफ़ोन वाला हूँ चोंगा !
तुम मछली मानसरोवर की, मै सागर तट का हूँ घोगा !

दस मंजिल से गिर जाउंगा, मत आगे मुझे धकेल प्रिये !
मुश्किल है अपना मेल प्रिये, ये प्यार नहीं है खेल प्रिये!!

Wednesday, February 6, 2013

कितनी गिरहें खोली हैं मैने


कितनी गिरहें खोली हैं मैने
कितनी गिरहें अब बाकी हैं

पाँव  मे पायल,बाँहों में कंगन 
गले में हँसली ,कमरबंद च्हहले और बिछुए
नाक कान छिदवायें गये हैं  
और सेवर जेवर कहते कहते 
रीत रिवाज की रस्सियों से मै जकरी गयी 
उफ्फ !!कितनी तरह मै पकड़ी गयी 
अब छिलने  लग है हाथ पांव 
और कितनी खरासें उभरी हैं 
कितनी गिरहें हैं खोली है मैंने 
कितनी रस्सियाँ उतरी है 


अंग अंग मेरा रूप रंग
मेरे नक़्श नैन, मेरे भोले बैन
मेरी आवाज़ मे कोयल की तारीफ़ हुई
मेरी ज़ुल्फ़ शाम, मेरी ज़ुल्फ़ रात
ज़ुल्फ़ों में घटा, मेरे लब गुलाब
आँखें शराब
गज़लें और नज़्में कहते कहते
मैं हुस्न और इश्क़ के अफ़सानों में जकड़ी गयी

उफ़्फ़ कितनी तरह मैं पकड़ी गयी...

मैं पूछूं ज़रा, मैं पूछूं ज़रा
आँखों में शराब दिखी सबको, आकाश नहीं देखा कोई
सावन भादौ तो दिखे मगर, क्या दर्द नहीं देखा कोई
क्या दर्द नहीं देखा कोई

फ़न की झीनी सी चादर में
बुत छीले गये उरियानि के
तागा तागा करके पोशाक उतारी गयी
मेरे जिस्म पे फ़न की मश्क़ हुई
और आर्ट-कला कहते कहते
संगमरमर मे जकड़ी गयी

उफ़्फ़ कितनी तरह मैं पकड़ी गयी...

बतलाए कोई, बतलाए कोई
कितनी गिरहें खोली हैं मैने
कितनी गिरहें अब बाकी हैं

Sunday, February 3, 2013

मेरा गाँव अच्छा है

बड़ा भोला बड़ा सादा बड़ा सच्चा है
तेरे शहर से तो मेरा गाँव अच्छा है
वहां मैं मेरे बाप के नाम से जाना जाता हूँ
और यहाँ मकान नंबर से पहचाना जाता हूँ
वहां फटे कपड़ो में भी तन को ढापा जाता है
यहाँ खुले बदन पे टैटू छापा जाता है ...
यहाँ कोठी है बंगले है और कार है
वहां परिवार है और संस्कार है
यहाँ चीखो की आवाजे दीवारों से टकराती है
वहां दुसरो की सिसकिया भी सुनी जाती है ... ...
यहाँ शोर शराबे में मैं कही खो जाता हूँ
वहां टूटी खटिया पर भी आराम से सो जाता हूँ
यहाँ रात को बहार निकलने में दहशत है
वहां रात में भी बहार घुमने की आदत है
यहाँ मिस्टर कालीचरण कह कर बुलाते है
वहां कल्लू काका कह कर चरणों में शीश झुकाते है
मत समझो कम हमें की हम गाँव से आये है
तेरे शहर के बाज़ार मेरे गाँव ने ही सजाये है
वह इज्जत में सर सूरज की तरह ढलते है
चल आज हम उसी गाँव में चलते है .

Saturday, January 19, 2013

मेरे जीने की रफ्तार कम तो नहीं

मौत आती है आने दे डर है किसे, मेरे जीने की रफ्तार कम तो नहीं
बाँटते ही रहो प्यार घटता नहीं, माप लेना तू सौ बार कम तो नहीं

गम छुपाने की तरकीब का है चलन, लोग चिलमन बनाते हैं मुस्कान की
पार गम के उतर जूझना सीखकर, अपनी हिम्मत पे अधिकार कम तो नहीं

था कहाँ कल भी वश में ना कल आएगा, हर किसी के लिए आज अनमोल है
कई रोते मिले आज, कल के लिए, उनके चिन्तन का आधार कम तो नहीं

लोग धरती पे आते हैं रिश्तों के सँग, और बनाते हैं रिश्ते कई उम्र भर
टूट जाते कई उनमे क्यों सोचना, कहीं आपस का व्यापार कम तो नहीं

जिन्दगी होश में है तो सब कुछ सही, बोझ माना तो हर पल रुलाती हमे
ये समझकर अगर तू न समझा सुमन, सोच खुशियों का संसार कम तो नहीं।

Monday, August 13, 2012

रिश्तों के मायने

रिश्तों के मायने बदल जाते हैं,
 नए दायरों में जब बंध जाते हैं.
 खो जाती है अंतरंगता कहीं दूर
 तेवर बदले बदले नज़र आते हैं.
 साथ ही पले ,बड़े होते हैं सब
सुख दुःख में रोते हँसते जब
क्यों दूरियां बढा लेते हैं इतनी
 कि अपने दुश्मन बन जाते हैं.

 जिस खून से रिश्ता जुड़ा,प्यासे
 उसी के जाने कैसे बन जाते हैं.
 स्वार्थ के चश्मे से उजला नहीं
बस केवल स्याह ही देख पाते हैं.

 धन यश सब कुछ पा लेते हैं ,
 बस अपनेपन को ठुकराते हैं,
रिश्ते अनमोल होते हैं जग में ,
 उनका मोल नहीं जान पाते हैं.

 आओ मिटा देते हैं कटुता सभी ,
 मिठास से रिश्तों को सजाते हैं
 दीवारें घृणा की नहीं आओ ,
 रिश्तों का उपवन महकाते हैं.

Saturday, December 24, 2011

जिंदगी है की फिर भी प्यारी है

दिन परेशान है रात भारी है , जिंदगी है की फिर भी प्यारी है
क्या तमाशा है कबसे जारी है जिंदगी है की फिर भी प्यारी है

इस कहानी को कौन रोकेगा , उम्र ये सारी कौन सोचेगा
साथ काटी है या गुजारी है , जिंदगी है की फिर भी प्यारी है
...
रंगों से कहूँ लकीरों से कहूँ मैली मैली सी तस्वीरो से कहूँ
बेकरारी सी बेकरारी है , जिंदगी है की फिर भी प्यारी है

Wednesday, September 28, 2011

मेरा हिन्दुस्तां

जहाँ हर चीज है प्यारी
सभी चाहत के पुजारी
प्यारी जिसकी ज़बां
वही है मेरा हिन्दुस्तां

... जहाँ ग़ालिब की ग़ज़ल है
वो प्यारा ताज महल है
प्यार का एक निशां
वही है मेरा हिन्दुस्तां

जहाँ फूलों का बिस्तर है
जहाँ अम्बर की चादर है
नजर तक फैला सागर है
सुहाना हर इक मंजर है
वो झरने और हवाएँ,
सभी मिल जुल कर गायें
प्यार का गीत जहां
वही है मेरा हिन्दुस्तां

जहां सूरज की थाली है
जहां चंदा की प्याली है
फिजा भी क्या दिलवाली है
कभी होली तो दिवाली है
वो बिंदिया चुनरी पायल
वो साडी मेहंदी काजल
रंगीला है समां
वही है मेरा हिन्दुस्तां

कही पे नदियाँ बलखाएं
कहीं पे पंछी इतरायें
बसंती झूले लहराएं
जहां अन्गिन्त हैं भाषाएं
सुबह जैसे ही चमकी
बजी मंदिर में घंटी
और मस्जिद में अजां
वही है मेरा हिन्दुस्तां

कहीं गलियों में भंगड़ा है
कही ठेले में रगडा है
हजारों किस्में आमों की
ये चौसा तो वो लंगडा है
लो फिर स्वतंत्र दिवस आया
तिरंगा सबने लहराया
लेकर फिरे यहाँ-वहां
वहीँ है मेरा हिन्दुस्तां

Wednesday, July 13, 2011

माँ

लबों पर उसके कभी बददुआ नहीं होती,
बस एक माँ है जो कभी खफ़ा नहीं होती।

इस तरह मेरे गुनाहों को वो धो देती है
माँ बहुत गुस्से में होती है तो रो देती है।

जब भी कश्ती मेरी सैलाब में आ जाती है,
माँ दुआ करती हुई ख्वाब में आ जाती है।

मेरी ख़्वाहिश है कि मैं फिर से फरिश्ता हो जाऊं
मां से इस तरह लिपट जाऊँ कि बच्चा हो जाऊँ।

Saturday, June 25, 2011

शायरी

न कत्ल करते हैं, न जीने की दुआ देते हैं,
लोग किस जुर्म की आखिर ये सज़ा देते है ।
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यूं तो मंसूर बने फिरते हैं कुछ लोग,
होश उड जाते हैं जब सिर का सवाल आता है ।
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मुझे तो होश नही, तुमको खबर हो शायद ,
लोग कहते है कि तुम ने मुझ को बर्बाद कर दिया ।
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आखिर काम कर गए लोग ,
सच कहा और मर गए हम लोग ।
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बस्ती मे सारे लोग लहू मे नहा गए,
लह्ज़ा नए खीताब का कितना अजीब था ।
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देखिए गौर से रुक कर किसी चौराहे पर,
जिंदगी लोग लिए फिरते हैं लाशों के तरह ।
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इस नगर मे लोग फिरते है मुखौटे पहन कर,
असल चेहरों को यहां पह्चानना मुमकिन नही ।
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कुछ लोग ज़माने ऐसे भी तो होते हैं ,
महफिल में जो हंसते हैं, तन्हाई मे रोते हैं ।